माइनिंग और प्रूफ़ ऑफ़ वर्क
माइनिंग वह तरीक़ा है जिससे बिटकॉइन तय करता है कि अगला ब्लॉक कौन जोड़ेगा, और इसी से नए बिटकॉइन चलन में आते हैं। माइनर एक अनुमान वाली पहेली पर कंप्यूटिंग पावर ख़र्च करके मुक़ाबला करते हैं। यह पाठ पहेली को समझाता है और बताता है कि यह नेटवर्क की रक्षा क्यों करती है।
माइनर का काम
माइनर इंतज़ार कर रहे लेन-देन को एक संभावित ब्लॉक में इकट्ठा करता है और जाँचता है कि वे नियमों के मुताबिक़ हैं। नेटवर्क वह ब्लॉक तभी मानता है जब माइनर एक मुक़ाबला जीत ले।
पहेली
माइनर ब्लॉक में एक संख्या जोड़ता है, जिसे नॉन्स कहते हैं, और उसका हैश निकालता है। नियम यह है कि ब्लॉक का हैश नेटवर्क के तय किए टारगेट से नीचे आना चाहिए। हैश का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, इसलिए कोई शॉर्टकट नहीं है। माइनर संख्या बदलता है और फिर कोशिश करता है।
पूरे नेटवर्क में माइनिंग मशीनें हर सेकंड ऐसे सैकड़ों क्विंटिलियन अनुमान लगाती हैं। जो माइनर सबसे पहले सही हैश खोजता है, वह ब्लॉक को नेटवर्क में भेज देता है, और हर दूसरा नोड एक ही गणना से उसे जाँच सकता है। बनाना मुश्किल और जाँचना आसान: यही प्रूफ़ ऑफ़ वर्क है।
इनाम
जीतने वाले माइनर को नए बने बिटकॉइन और ब्लॉक के लेन-देन की चुकाई गई फ़ीस मिलती है। नए बिटकॉइन बनने का यही इकलौता तरीक़ा है। अप्रैल 2024 से नया बनने वाला हिस्सा हर ब्लॉक पर 3.125 बिटकॉइन है, और पाठ 5 बताता है कि यह कैसे घटता है।
डिफ़िकल्टी ब्लॉकों के बीच दस मिनट बनाए रखती है
अगर और माइनर जुड़ें, तो ब्लॉक तेज़ी से आने लगेंगे। इसलिए हर 2,016 ब्लॉक पर, यानी लगभग दो हफ़्ते में, नेटवर्क टारगेट को बदलता है ताकि औसत फिर दस मिनट हो जाए। ज़्यादा माइनिंग पावर से पहेली कठिन होती है। इससे ज़्यादा बिटकॉइन नहीं बनते।
इससे नेटवर्क सुरक्षित क्यों रहता है
इतिहास दोबारा लिखने के लिए हमलावर को बदले गए ब्लॉक और उसके बाद के हर ब्लॉक का प्रूफ़ ऑफ़ वर्क फिर से करना होगा। फिर उसे ईमानदार चेन से आगे निकलना होगा, जिसके लिए बाक़ी पूरे नेटवर्क को मिलाकर उससे ज़्यादा कंप्यूटिंग पावर चाहिए। इसे अक्सर 51% हमला कहते हैं।
बिटकॉइन पर मशीनों और बिजली की लागत ही हमले से रोकती है। छोटे प्रूफ़ ऑफ़ वर्क कॉइन आसान निशाने हैं: MIT के शोधकर्ताओं ने 2019 से उन पर चेन को गहराई से दोबारा लिखने के 40 से ज़्यादा मामले दर्ज किए हैं।
क़ीमत: ऊर्जा
प्रूफ़ ऑफ़ वर्क अपनी बनावट से ही बहुत बिजली ख़र्च करता है, और इसकी सबसे बड़ी आलोचना यही है। कैम्ब्रिज के शोधकर्ताओं का अनुमान था कि 2023 में बिटकॉइन माइनिंग ने लगभग 120 टेरावॉट-घंटे बिजली इस्तेमाल की, जो दुनिया की बिजली माँग का 0.2% से 0.9% है। अब माइनिंग ख़ास मशीनों से होती है, आम तौर पर बड़ी इकाइयों में, और माइनर अपनी ताक़त पूल में मिलाकर इनाम बाँटते हैं।
दूसरे नेटवर्क अलग तरीक़े से सुरक्षित रहते हैं। एथेरियम सितंबर 2022 में प्रूफ़ ऑफ़ स्टेक नाम के तरीक़े पर चला गया, जिससे उसकी ऊर्जा खपत लगभग 99.95% घट गई। पाठ 8 इसके बारे में है।
अगर दोगुने माइनर जुड़ जाएँ, तो क्या नेटवर्क दोगुने बिटकॉइन बनाता है?
माइनर ब्लॉक जोड़ने का हक़ पाने के लिए असली ऊर्जा ख़र्च करते हैं। यही लागत बिटकॉइन के इतिहास को दोबारा लिखना महँगा बनाती है।
स्रोत
- Bitcoin developer guide: Block chain and proof of work
- Bitcoin developer guide: Mining
- Blockchain.com: network hash rate
- Bitcoin Wiki: Controlled supply
- MIT Digital Currency Initiative: 51% attacks
- US Energy Information Administration: electricity use of cryptocurrency mining
- ethereum.org: The Merge
8 अक्टूबर 2026 को इन स्रोतों से तथ्य जाँचे गए।
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